यूट्यूबर व स्वयं घोषित पत्रकार कर रहे है पत्रकारिता को बदनाम, फर्जी पत्रकारों की बाढ़ में कलमकारों को ढूंढना पड़ रहा भारी

पत्रकारिता का चोला ओढ़कर की जा रही वसूली,ब्लैकमेलिंग,अवैध उगाही, ऐसे कथित पत्रकारों के खिलाफ चलना चाहिए अरेस्टिंग अभियान

झारखण्ड में इन दिनों दर्जनों यूट्यूबर व स्वयं घोषित पत्रकार सक्रिय है। ऐसे पत्रकार बिन बुलाऐ सामाजिक, राजनितिक, धार्मिक व प्रशासनिक कार्यक्रमों में मोबाइल फोन से विडियो बनाते और थैली में न्युज चैनलों जैसा माइक बूम लेकर दिखाई पड़ते है। यही नहीं अब ऐसे किस्म के पत्रकार अपने स्वयं सत्यापन व हस्ताक्षर वाला प्रेस आई कार्ड भी गले में पहने दिखाई देते है। इसके आलावा यूट्यूब पर फर्जी नाम का न्युज चलाने वाले अब प्रेस आईडी कार्ड बेचने का धंधा भी शुरू कर दिया है। सुत्रों की माने तो जिले में 2500 से 5000 हजार रूपये तक में प्रेस आईडी कार्ड की बिक्री की जा रही है। अवैध शराब, गांजा, अफीम व ब्राउनशुगर विक्रेता आदि जितने भी अवैध धंधे करने वाले होते है अधिकांश लोग प्रेस आईडी कार्ड होल्डर है। वो अपने वाहनों पर प्रेस लिखवाकर दिन भर नियम, कानून की धज्जियां उड़ाते है। इसके आलावा लोहा पीटने वाला, शौचालय में पानी मारने वाला, कपड़ा स्त्री करने वाला, सर्विस सेंटर व मोटरसाइकिल रिपेरिंग करने वाला भी वर्तमान समय में कही ना कही पत्रकारिता से जुड़ा हुआ है। कई बार समझ में नहीं आता है कि ऐसे लोगों को क्या कहा व माना जाये। हम उन्हें मौके का फायदा उठाने वाला धोखेबाज कहे या उद्यमी ? ऐसे फर्जी पत्रकारों द्वारा पत्रकारिता का स्तर गिरने के कारण प्रतिष्ठित पत्रकारों को भी फर्जी केस में फसाने के लिए तरह-तरह के ताने-बाने बुने जा रहे है। ऐसे कई मामले अब सामने भी आने लगे है।

पत्रकारिता यू तो लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है। पत्रकार वही होता है, जिसके सवालों में दम और बेबाक लेखनी का माहिर हो। समाज को आइना
दिखा सके, लेकिन साहब यहां तो पत्रकार नहीं बल्कि ब्लैकमेलरों की संख्या ज्यादा नज़र आती हैं, ऐसे कथित पत्रकार जिन्हें न पढ़ना आता, न बोलने का कोई सहूर है। न सवालों का कोई पता और न ही पत्रकारिता की सही मायने में कोई समझ है। सिर्फ ब्लैकमेलिंग और अवैध उगाही को पत्रकारिता समझते हैं, जिनके कारण पत्रकारिता में महारत रखने वाले सम्मानित पत्रकारों को भी कभी कभी अपमान का सामना करना पड़ जाता है। ऐसे कथित पत्रकार न डॉक्टर्स को देखते है, न किसी ठेले वाले को। इन कथित पत्रकारों की वजह से पत्रकारिता का स्तर गिरता जा रहा है, और इनमें अकड़, एटीट्यूड बेशुमार दिखता हैं, जबकि अंदर न कोई ज्ञान होता है और न ही शिक्षा उनके पास होती है। ब्लैकमेलिंग करने वाले ऐसे ही कुछ पत्रकारिता का चोला ओढ़कर ब्लेकमेलर आपके पास यदि आये तो उनसे उनकी शैक्षिक योग्यता पूछकर उनसे दो चार सवाल उल्टे कर लीजिए और जरूरत पड़ने पर तुरंत उन्हें पुलिस को सौप दे। क्योकि ब्लैकमेलिंग की नीयत से आपके काम में दखल देने वाले ऐसे फर्जी लोग पत्रकार नहीं होते। बस कार्डधारक हो सकते है। उनसे डरने की बजाय बल्कि उन्हें मुहतोड़ जवाब देकर चलता करे, न माने तो पुलिस को शिकायत कर उन्हें हवालात का रास्ता दिखाए।

स्वयं घोषित पत्रकार सरकारी व गैर सरकारी प्रेसवार्ता में करते हैं शिरकत, सूचना जनसंपर्क विभाग क्यों है मौन

सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि स्वयं घोषित पत्रकार जिले के जिला व पुलिस प्रशासन समेत कई सरकारी और गैर सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं जो कि पूर्णतः गलत है। ऐसा नहीं है कि जिला सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को इस बात की जानकारी नहीं है। इसके बावजूद भी सरकारी कार्यक्रमों में ऐसे तथाकथित पत्रकारों को अनुमति दिया जाना कई अनसुलझी सवालों को जन्म देता है। समय रहते अगर ऐसे तथाकथित पत्रकारों पर जिला सूचना जनसंपर्क विभाग कार्रवाई नहीं करती है तो आने वाले दिनों में इस महकमे की परेशानी बढ़ेगी। ऐसे में जिले के श्रमजीवी पत्रकार जिला प्रशासन से या मांग करती है कि तथाकथित पत्रकारों की पहचान करवा कर उन पर उचित करवाई करें।

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